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Showing posts from July, 2019

उधार के 2000/- से बची मेरी जिंदगी।

दस दिन बाद मैं अपने ससुराल पहुंची। वहां मेरी सांस अपने निकम्मे बेटे को बोलने के बजाय मुझे ताने मारने लगी। दिन ब दिन सास के ताने बढ़ते ही जा रहे थे। मैं अधिकाधिक डिप्रेशन में जा रही थी। दिन भर के तानों से मैं पक जाती थी ।ऊपर से घर की हालत कुछ ज्यादा ही बदतर थी। कोई इनकम का सोर्स नहीं था।

       मैं पल-पल, मर-मर के जी रही थी। मैं इस हालात में बच्चे को जन्म देने की सोच ही नहीं सकती थी। उस समय मेरे दिमाग में एक ही बात आती।  बस अपने आप को खत्म करना है।

रोज मुझे कोई ना कोई मिलने आता। मुझे देखने आते थे लोग। जैसे किसी झू (zoo) में कोई नया जानवर आने पर लोग जाते हैं। उसे देखने। इसी तरह आस पड़ोस के गांव से  मुझे देखने आते थे वह इसलिए।

        सारे गांव भर में चर्चा का विषय बन गया था। कि गरीब घर के लड़के ने एक ऐसा परिवार जो दो समय खाने की रोटी नहीं जुटा पाता। ऐसे परिवार में एक राजकुमारी सुंदरसी बहू बनकर आ गई। मैं बहुत सुंदर भी थी। सावला गेहुआ रंग, नाक ,नक्ष की बनावट जैसे फुर्सत से बनाया हो। उपर वाले ने शरीर यश्टी अट्रैक्टिव होने से मैं सुंदर दिखती थी।

लोग मुझे देखने आते। मेरी सुंदरता की तारीफ करते और…

मेरा स्वभाव ही मेरी पहेचान है।

मैं वहां अपने आपको एडजस्ट ही नहीं कर पा रही थी। मेरे सोचने, समझने की ताकत खत्म हो गई थी। आखिर मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा जो हुआ था। इधर मैं अपने मां-बाप और भाई-बहनों के हालात सुधरे उन्हें कुछ सहारा हो जाए। इस समझौते के साथ आई थी।

       लेकिन जिसने मुझे सहारा देने का वादा किया। सपने दिखाए। वही इंसान खुद बेसहारा, निकम्मा और आलसी निकला। वह अपने घर परिवार के हालात सुधारने के बजाय अपने भाई-बहनों के बारे में सोचने के बजाय खुद शादी कर लिए। जो अपने परिवार के बारे में नहीं सोच सका। वह क्या? मेरे परिवार का सोचता। मैं गर्भवती थी। मुझे वैसे ही खाना नहीं चलता था। सुबह शाम उल्टियां होती थी। ऊपर से मैं डिप्रेशन में जी रही थी।

           एक पल लगता। क्या करूं मैं जिकर। मेरे सारे सपने चूर- चूर हो चुके थे। ना मैं अपने उस परिवार के लिए। कुछ कर पाई। ना अब चाहकर भी इस परिवार के लिए। कुछ कर सकती थी। ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं। मात्र 12th पास और फिर गांव में कोई सुविधा भी नहीं थी ।

          इन हालातों में मानो मै जल बिन मछली की तरह हो गई थी। मैं तैरना तो चाहती थी। मगर पानी नहीं था। मैं उड़ना चाहती थी। मगर मुझ…

कुएं से निकल कर खाई में गिरी !!

मैं खुशी-खुशी चल पड़ी अपने पति के साथ 3 घंटे के सफर के बाद एक गांव में पहुंची। तबभी बिना कुछ पूछे। कि हम कौन से गांव आए। साथ चलती रही। बस मुझे लगा मैं मेरे गांव पहुंच गई। फिर हम घर की तरफ जाने लगे। थोड़ी ही देर में घर आया वहां जाते ही एक आधी उम्र की महिला अंदर से बाहर आई। हमें देखते ही मुस्कुराते हुए। अंदर गई फिर एक बकेट में पानी लेकर आई और बोली पैर धो लो और अंदर आ जाओ।
            हम अंदर गए। बैठे तब चाय बना कर ले आई। और हमारे साथ बैठकर बतिया ने लगी। तब बीच-बीच में साहब उसे मौसी बोल रहे थे। मैं बड़ी उधेड़बुन में थी। कि यह उसे मौसी क्यों? बोल रहे हैं। रहा नहीं गया तो मैंने पूछ ही ली। 'यह आपकी मौसी है क्या ?' तब मुझे पता चला मैं अपने घर नहीं बल्कि मौसी सास कि यहां आई हूं। 
            हंसी- खुशी से आठ-दस दिन बीते इस दौरान मुझे उल्टी शुरू हुई और खाना भी नहीं चल रहा था। इस वजह मैं वीक हो रही थी। पर मुझे साहब ने अस्पताल में नहीं दिखाया और ना ही कोई दवाई करवाई। मैं दिन-ब-दिन विक होने लगी थी। और मेरी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब होने लगी ।फिर मैंने कहा मुझे अपने घर लेकर चलीए या फिर मुझ…

मैं और मेरी कहानी

कुछ दिन इसी तरह कशमकश में बीत गए। मैं मन से पूरी तरह तैयार नहीं थी। फिर एक दिन मैं जंगल से लकड़ी लेकर आई और नहाई फिर खाना खाकर सो गई। मई का महीना था। कड़ी धूप और मैं थकी हुई। मैं जल्दी ही नींद के आगोश में आ गई। और सोते समय दरवाजा खुला रखा था। घर में न जाने कब दिनेश आया और मौका पाकर वह मुझ से जबरदस्ती करने लगा। मैं कुछ करती। उससे पहले ही वह मुझ पर हावी हो चुका था। जब उसकी तृप्ति हुई तब उसने मुझे छोड़ा मैं लहूलुहान हो चुकी थी। मेरी इज्जत तार-तार हो गई थी। बहुत रोई जैसे तैसे खुद को संभाला। लहू से भरे कपड़े और चादर धोकर सुखा दिए। शाम को मां घर आई तो दिल ने कई बार चाहा कि मां को बताओ मगर हिम्मत नहीं जुटा पाई। मैंने किसी से बात नहीं की तबीयत ठीक नहीं बोल कर चुपचाप बिस्तर पर पड़ी रही। रात पूरी रोने में निकली। दूसरे दिन फिर दिनेश आया। और मुझे समझा ने लगा जो हुआ वह मेरा प्यार था। तू मान नहीं रही थी। इसलिए यह सब करना पड़ा। अब तू मेरी है। हम जल्दी ही शादी करेंगे। अब मुझे उस पर थोड़ा विश्वास होने लगा। मैं भी उसे चाहने लगी। रोज का सिलसिला चलता रहा। जब भी मौका मिलता। …

मैं और मेरी कहानी

किसी ने मुझसे एक बार पूछा होता। कि मेरी मर्जी क्या है। अगर कोई यह सवाल करता तो। मैं जवाब में शादी से इंकार कर देती। पर कोई पूछता भी क्यों? उस लड़के ने वहां मौजूद लोगों को अपना परिचय ही ऐसे दिया। उस लड़के का नाम दिनेश। दिनेश ने अपना परिचय देते हुए कहा। मेरा बड़ा भाई आर्मी ऑफिसर है। मैं भी ट्राय कर रहा हूं। आर्मी के लिए। मेरी 10 एकड़ खेती (जमीन) है। खेत में कुआं है। हैंडपंप है। यानी कि पानी की सुविधा है। इस कारण साल में दो बार अच्छी फसल निकाल लेते हैं। घर में मां-पिताजी और दो बहाना है। जो पढ़ रही है। मैं इस परिवार की जिम्मेदारी लेता हूं। साल भर खाने के लिए चावल अपने घर से ला दिया करूंगा। मेरे भाई-बहनों के पढ़ाई का खर्चा भी उठाएगा। और मेरी बहनों की शादी में हेल्प करेगा। अब आप ही बताइए। इतना बोलने के बाद जमा हुई मंडली क्या? फैसला लेती। उस समय उन लोगों को लगा मेरी किस्मत चमक उठी। काश एक बार किसी ने सच्चाई जानने की कोशिश की होती। सभी ने दिनेश की बातों पर हां का स्टांप लगा दिया। मैं भी खुश थी। मुझे भी ऐसा ही लगा था। उस वक्त 'शायद मेरी किस्मत अच्छी है' जो मुझे इतना प्…

मैं और मेरी कहानी

जिंदगी मुस्कुराने ही लगी कि, तभी एक तूफान आया मेरी जिंदगी में एक दिन अचानक एक लड़के से मुलाकात हुई। और वह दिन मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा हादसा (दुर्घटना) साबित हुआ। वह मुझे चाहने लगा। किसी ना किसी बहाने से मुझे रोज मिलने लगा। उसकी हरकतों से मुझे यह एहसास हो चुका था। और इसलिए मैं दूर रहने की कोशिश करती थी। मेरे ऊपर जिम्मेदारी का बोझ था मेरा बचपन तो खो चुका था। मगर मेरे बहन-भाइयों का बचपन नहीं खोना चाहती थी। उनकी खुशी उनकी पढ़ाई में अपने आप को झोंक चुकी थी। प्यार के लिए या किसी एहसास के लिए मेरे जीवन में कोई जगह नहीं थी। मैं अपने परिवार के बिना किसी और के लिए सोच ही नहीं सकती । फिर एक दिन उसने मुझे प्रपोज किया मैंने मना कर दी लेकिन वह नहीं माना और मेरे सामने उसने अपनी कलाई काट दी "शायद न्यू ब्लेड वह अपनी जेब में रखे था और घर से सोच कर ही आया होगा"जैसे हाथ की नस कटी वैसे ही वह बेहोश गिर पड़ा मैं घबरा गई जोर जोर से चिल्लाने चीखने लगी उस वक्त पड़ोस में जो थे सब दौड़ते आए और उस लड़के को अस्पताल लेकर चले गए उसे होश आया ट्रीटमेंट किया और उसे लेकर मोहल्ले के 7-8 मान्यवर लोग मेरे घर…

मैं और मेरी कहानी

मेरी कहानी तब से शुरू होती है जब मैं केवल 13 साल की थी मेरे माता-पिता को हम पांच बेटियां और दो बेटे थे तब तक सब कुछ ठीक चल रहा था हम जो मांगे वह हमें मिलता था हमारी हर जरूरतें पूरी हो जाती थी पापा हमें वह हर चीज लाकर देते जो मां बाप अपने बच्चों को देते हैं लेकिन मुझे सातवें नंबर पर जो भाई हुआ छोटा उसके बाद हमारी जो आर्थिक परिस्थिति थी वही ऐसी चेंज हुई जैसे मानो हम कहानियों में सुनते आए हैं कि कोई राजा और रंक बन गया सेम उसी तरह से हमारी आर्थिक परिस्थिति में चेंजर सागर मेरे पिताजी को कुछ बुरे लोगों की दोस्ती लग चुकी थी और पिताजी के बिजनेस में उनको बहुत लाश लॉस उठाना पड़ा और इसके चलते जो नशे की आदत थी पापा की और बढ़ते गई ऐसे करते-करते हम इतने गरीब हो चुके थे कि ना हम दाने दाने के लिए मौका से दो वक्त की रोटी मिलना भी हमें नसीब नहीं होता छोटे छोटे भाई बहन मेरे सामने बुक से विकल कर रोते थे मैं उन्हें रोटी रोटी के लिए मोहताज देखी थी तिलमिला जाती थी कि मैं अपने भाई बहन नीम का पेड़ कैसे भूलू कहां से खाना लाओ कौन देगा मुझे खाना ऐसा मैं क्या करूं काम अपने भाई-बहनों के लिए दो वक्त की रोटी कमा सक…