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कुएं से निकल कर खाई में गिरी !!

मैं खुशी-खुशी चल पड़ी अपने पति के साथ 3 घंटे के सफर के बाद एक गांव में पहुंची। तबभी बिना कुछ पूछे। कि हम कौन से गांव आए। साथ चलती रही। बस मुझे लगा मैं मेरे गांव पहुंच गई। फिर हम घर की तरफ जाने लगे। थोड़ी ही देर में घर आया वहां जाते ही एक आधी उम्र की महिला अंदर से बाहर आई। हमें देखते ही मुस्कुराते हुए। अंदर गई फिर एक बकेट में पानी लेकर आई और बोली पैर धो लो और अंदर आ जाओ।
            हम अंदर गए। बैठे तब चाय बना कर ले आई। और हमारे साथ बैठकर बतिया ने लगी। तब बीच-बीच में साहब उसे मौसी बोल रहे थे। मैं बड़ी उधेड़बुन में थी। कि यह उसे मौसी क्यों? बोल रहे हैं। रहा नहीं गया तो मैंने पूछ ही ली। 'यह आपकी मौसी है क्या ?' तब मुझे पता चला मैं अपने घर नहीं बल्कि मौसी सास कि यहां आई हूं। 

            हंसी- खुशी से आठ-दस दिन बीते इस दौरान मुझे उल्टी शुरू हुई और खाना भी नहीं चल रहा था। इस वजह मैं वीक हो रही थी। पर मुझे साहब ने अस्पताल में नहीं दिखाया और ना ही कोई दवाई करवाई। मैं दिन-ब-दिन विक होने लगी थी। और मेरी तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब होने लगी ।फिर मैंने कहा मुझे अपने घर लेकर चलीए या फिर मुझे मेरे मायके छोड़ दीजिए। वह अपने घर चलने को तैयार ही नहीं थे। मुझे समझ में नहीं आ रहा था। कि मैं क्या करूं आखिर यह अपने गांव क्यों नहीं चल रहे हैं। उधर इनकी मौसी भी अब नस-नस (पुट- पुट) करने लगी थी।

            हर किसी को मेहमान 2 दिन के अच्छे लगते हैं ।ज्यादा दिन के मेहमान किसी को पसंद नहीं होते। फिर एक दिन मेरी उनसे लड़ाई हो गई ।और मैं अकेले अपने घर जाने के लिए निकल पड़ी। तब वो मेरे पीछे आए। और बस पकड़े अपने गांव लेकर आए। शाम के 7:00 बजे थे हम अपने गांव पहुंचे छोटा सा गांव था। तो चारों तरफ अंधेरा छाया था। उसी अंधेरे में घर पहुंचे घर में भी अंधेरा ही था एक चिराग जल रहा था। दो लड़कियां बैठी थी। हमे देख एक उठी और दौड़कर पानी लेने गई। सभी को आवाज लगाते हुए। "आई, बाबू ,भाऊ वहिनी घेऊन आला आहे। सर्व बहेर या " सब बाहर आए हमें देखने लगे। मगर अंधेरे में ना मैं उन सबको अच्छे से देख पाई और शायद उन लोगों ने भी मुझे ठीक से नहीं देखा ।

           घर का माहौल ठीक था। बातें हुई सबसे पहचान हुई। फिर थोड़ी ही देर में हम सब ने मिलकर खाना खाएं। और जल्दी ही सब सो गए। रात में अंधेरे के कारण कुछ समझ में नहीं आया। जब मैं सुबह उठी और बाहर गई। तब देखी 'मुझे जिस महल का सपना दिखाकर मेरे पति ने मुझसे शादी कर ले कर आया। वह तो घर भी नहीं था। एक झोपड़ी थी।' उस झोपडी पर चारों तरफ घास डला था।

           मेरी सास पुरानी साड़ी पहनी थी। दो ननंद पुराने से सूट पहने थी। देवर वह उस वक्त 7 साल का रहा होगा। उसने फटा पुराना पैंट पहना था। और मेरे ससुर जी पतली सी फटी पुरानी धोती। वह भी लूंगी की तरह लपेटे हुए थे।

            यह सब देखकर मैं कोमा में ही चली गई। यह मेरे साथ क्या हो गया। मेरे सारे सपने चूर चूर होकर बिखर गए। मेरे पांव के नीचे ना जमीन थी और ना मेरे सर पर छत। अब मैं क्या करूं मेरी समझ से परे था। बस मेरे दिमाग में एक ही बात घूम रही थी। "मैं कुए से निकल कर खाई में गिरी। " आगे कल।

       स्टोरी अच्छी लगी हो तो Like और Share कीजिए ।                                    // धन्यवाद // 

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