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मेरा स्वभाव ही मेरी पहेचान है।

मैं वहां अपने आपको एडजस्ट ही नहीं कर पा रही थी। मेरे सोचने, समझने की ताकत खत्म हो गई थी। आखिर मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा जो हुआ था। इधर मैं अपने मां-बाप और भाई-बहनों के हालात सुधरे उन्हें कुछ सहारा हो जाए। इस समझौते के साथ आई थी।

       लेकिन जिसने मुझे सहारा देने का वादा किया। सपने दिखाए। वही इंसान खुद बेसहारा, निकम्मा और आलसी निकला। वह अपने घर परिवार के हालात सुधारने के बजाय अपने भाई-बहनों के बारे में सोचने के बजाय खुद शादी कर लिए। जो अपने परिवार के बारे में नहीं सोच सका। वह क्या? मेरे परिवार का सोचता। मैं गर्भवती थी। मुझे वैसे ही खाना नहीं चलता था। सुबह शाम उल्टियां होती थी। ऊपर से मैं डिप्रेशन में जी रही थी।

           एक पल लगता। क्या करूं मैं जिकर। मेरे सारे सपने चूर- चूर हो चुके थे। ना मैं अपने उस परिवार के लिए। कुछ कर पाई। ना अब चाहकर भी इस परिवार के लिए। कुछ कर सकती थी। ज्यादा पढ़ी-लिखी भी नहीं। मात्र 12th पास और फिर गांव में कोई सुविधा भी नहीं थी ।

          इन हालातों में मानो मै जल बिन मछली की तरह हो गई थी। मैं तैरना तो चाहती थी। मगर पानी नहीं था। मैं उड़ना चाहती थी। मगर मुझे पंख नहीं थे। अब ऐसे में क्या करती मैं, मेरी चारों तरफ अंधेरा ही अंधेरा था।

            मेरी हर रात रोने में ही गुजरती। साहब का क्या? उसे तो कुछ फर्क ही नहीं पड़ा। ना मेरे रोने का और ना किसी सवाल का। मुझे अपनाने के लिए जिस लड़के ने अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी कलाई काट दी थी। अब वह लड़का इस इंसान में दूर-दूर तक दिखता ही नहीं था। सारी परिस्थिति में, मैं अकेले ही खड़ी थी। जिसने साथ देने का वादा कर मुझे अपने घर ले आया। वह मेरे साथ था ही नहीं।

          कुछ दिन ऐसे ही निकले। बारिश का मौसम, अगस्त का महीना लग चुका था। काश्तकार (Farmer) लोगों ने न  धान लगाना (रोपना) शुरू कर दिया था। ₹100 रोजी थी। रोपा लगाने की। कुछ लोग मेरे यहां भी बुलाने आए। तो मेरी सास ने एक बार भी मुझसे नहीं पूछा, कि तुझे रोप ना आता है या नहीं? और आता भी है। तो तबीयत ठीक नहीं है। गर्भवती है। कुछ नहीं सोचा और अपने साथ मेरी रोजी भी लगा दी। अब क्या था। मुझे सांस के साथ खेत में धान लगाने (रोपा) लगाने जाना पड़ा हालांकि मैं जाने की स्थिति में नहीं थी।

            खाना भी नहीं चलता था। और नींद भी नहीं होती थी। ऊपर से सोच-सोच कर अकेले में रोते रहना यही मेरी तबीयत खराब होने का कारण था। लेकिन मजबूरी में सांस के साथ जाना पड़ा। लगातार 20 दिन धान लगाने गई फिर तबीयत कुछ ज्यादा खराब हुई। तो मैं नहीं जा सकी। फिर भी मुझे दवाई नहीं कराई गई।

         दूसरे दिन ही राखी का त्यौहार था। मुझे अपने मायके वालों की याद भी सता रही थी। सो मौका देखकर मैं मायके जाने के लिए बोली तो ₹200 दिए और साहब को मेरे साथ जाने के लिए कहां गया। सो मैं उसी शाम तक अपने मायके पहुंची। मुझे देख सब खुशी से झूम उठे और मेरे भाई-बहन लिपटकर खुशी से रोने लगे।

             मैं पहली बार अपने परिवार से दो महा दूर रही थी। हमने मस्त इधर- उधर की बातें की। बातों के बीच- बीच मा ने मुझे तीन से चार बार पूछा कि "तेरी तबीयत ठीक नहीं है क्या ?" तू बहुत कमजोर लग रही है। मेरा ध्यान था। मेरी मां की नजरों पर वह बार-बार मुझे देख रही थी। पर मैं जानबूझ कर देख कर भी अनदेखा कर रही थी। उसके सवालों को टाल रही थी।

           क्योंकि मैं, मां को परेशान करना नहीं चाहती थी। मां की नजरों में, सबसे स्ट्रांग और बहादुर में ही थी। उसे कैसे बताती कि मैं पूरी तरह से टूट चुकी हूं। फिर दूसरे दिन मां के साथ में अस्पताल गई। दवा कराइए मेरा परिवार गरीब जरूर था। मगर मेरे अपने मेहनत, स्वभाव और अच्छे आचरण के चलते सब बहुत मानते थे। मैंने अपने गांव में अपनी छोटी-सी पहचान बना ली थी। चाहे हालात कैसे भी हो। पैसे नहीं भी रहे। तो भी वक्त आने पर मै या, मेरा परिवार किसी चीज के लिए नहीं अड़ते थे। डॉक्टर भी हमारा फैमिली डॉक्टर ही था। वह भी कभी पैसे है या नहीं यह नहीं पूछता और इलाज करता किराना, कपड़ा हर चीज वक्त पर हमें मिल जाती है। मेरी पहचान ही ऐसी बन गई थी। मेरे गांव के लोग मेरे नाम से गर्व महसूस करते और कहते अगर भगवान लड़की दे तो ऐसी दे ।यहां पर मैं अपनी तारीफ नहीं कर रही हूं। बस मैं यह बताना चाहती हूं। कि गरीबी की भी एक पहचान होती है। वह उसके आचरण से उसके स्वभाव गुण से।

             गरीब की एक कुंजी होती है। उसका अपना स्वभाव।" स्वीकार करने की हिम्मत और सुधार करने की नियत, हो तो इंसान बहुत कुछ सिखा सकता है! हमको कितने लोग पहचानते हैं! उसका महत्व नहीं है! लेकिन क्यों पहचानते हैं! इसका महत्व है!" आगे कल

                                 // धन्यवाद //

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