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' घोसला ' पार्ट-2


                            ' घोसला '  पार्ट-2

             हम दोनों ने मंदिर जाकर शादी कर ली। मैं उनके साथ उनके घर गई। वहां पर मेरा खुशियों से स्वागत किया गया। जैसे एक बहु का गृह प्रवेश होना चाहिए। वैसा ही मेरा गृहप्रवेश कराया गया। प्रशांत अपने मा-बाप की इकलौती संतान थी। उन्होंने बेटे की पसंद को खुशी से स्वीकार कर लिया।

             मैं बहुत खुश थी। मेरे सास-ससुर बेटी की तरह मेरा ख्याल रखते थे। हम दोनों अपनी गृहस्थी बसा कर बहुत खुश थे। बस मुझे दुख होता था। जब मेरे मम्मी- पापा की याद आती तब। मैं उनसे मिलने जा भी नहीं सकती थी। मैं उनके लिए उसी दिन मर गई थी। जब मैं अपने घर से भागी थी। बाकी मेरे जीवन में खुशियां ऐसी थी। कि मानो भगवान् ने छप्पर फाड़कर मेरी झोली में खुशियां भर दी हो।

            देखते ही देखते 1 साल कैसे बिता मुझे पता ही नहीं चला। सास- ससुर और पति के प्यार में दिन, महीने कैसे निकले मुझे पता नहीं लगा। इस दौरान मैं पेट से रही। इस खबर ने घर की खुशियां दोगुनी कर दी। कुछ महीने बाद मेरी गोद भराई की गई। तब मैंने मेरे मम्मी- पापा को बूलावा (नेवता) भेजा लेकिन वह नहीं आए। उन्होंने अभी तक मुझे माफ नहीं किया था।

             मेरी डिलीवरी का समय जैसे-जैसे करीब आ रहा था। वैसे वैसे दिन-ब-दिन मेरी सासू मां का पूजा-पाठ करना बढ़ने लगा। और मुझे बेटा ही हो इसके लिए प्रार्थना करती थी। उसे वंश चलाने के लिए पोता चाहिए था। उसे पोते की चाहत थी। पर अफसोस। कि मेरी डिलीवरी हुई। और मुझे बेटी हुई थी। सांस की चाहत पर पानी फिर चुका था। वह नाराज हुई। पर नर्स ने नन्हीं परी को मेरी सांस को पकड़ाया तो वह उस नन्ही को देखकर सारी नाराजगी भूल गई।

             प्रशांत और मेरे ससुर भी बहुत खुश थे। खुशी- खुशी बेटी का नामकरण किया गया। सब कुछ अपनी अपनी जगह ठीक ठाक चल रहा था। बस एक चीज बदल चुकी थी। मेरी सास का बर्ताव। जब भी मौका मिलता था। मुझे ताना मारती। बेटी होना या बेटा होना यह मेरी हाथ में तो क्या दुनिया की किसी भी औरत के हाथ में नहीं होता है। मैं सांस के तनो को मन में नहीं लेती थी।  मैं उनकी नाराजगी समझती थी। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता बेटी हो या बेटा।

             मैं अपनी नन्हीं परी के लालन-पालन में व्यस्त थी। कुछ ऐसे ही नरम गरम दिन गुजरते रहे। और फिर में 3 साल बाद गर्भवती हुई। अब इस बार मेरी सांस ने जीद पकड़ ली लिंग परीक्षण कराने की। लिंग परीक्षा कराना मतलब कायदे से अपराध। मैं नहीं करा सकती और नहीं कराना चाहती थी ।जो भी मेरी कोख में पल रहा था। वह मेरा एक हिस्सा था मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता था बेटी लिया बेटा।

              अब मेरी सांस प्रशांत को मेरे खिलाफ भड़काने लगी। लड़के की चाहत ने मेरी सास को  पागल कर रखा था। घर में लड़के की चाहत रखने वाली वह अकेली थी। अब धीरे-धीरे उसने प्रशांत को और मेरे ससुर को भी अपनी चाहत के आगे झुका दिया था। लड़कों से ही वंश आगे बढ़ता है। और लड़कियां पराया धन होती है। ऐसे विचार धारणा वाली थी।

              अब मैं क्या करती। ना उन लोगो के। विचार बदल सकती थी और ना पेट में पल रहा बच्चा बदल सकती। दूसरी बार भी मुझे लड़की हुई। मुझे छोड़ सब नाराज हुए। आप मेरे घर का वातावरण (हवा) बदल चुका था। प्यार की जगह नफरत ने और सुख की जगह दुखों ने ले ली थी। सब मुझे नफरत भरी नजरों से देखते। मानो जैसे मैंने कोई अपराध  किया हो।

               बेटी को जन्म देकर मैंने कोई गुनाह किए या पाप  किया हो। मेरे सास-ससुर ने मेरी छोटी बेटी को छुआ तक नहीं। मैं कभी-कभी उसे जानबूझकर रोता छोड़ देती और काम में व्यस्त होने का नाटक करती। ताकि मेरी सांस मेरी नन्ही परी को पकड़े। पर कोई लाभ नही। ऐसा कभी नहीं हुआ।

               प्रशांत भी अपनी मां के वश में वह था। वो वही करता जो मां कहती। उसने भी मुझसे और बच्चों से दूरी बना ली थी। अब धीरे-धीरे मैं इस घर की बहु रानी से नौकरानी बनते चली गई। और फिर एक दिन मेरे कानों तक कुछ शब्द पहुंचे जिसे सुनकर मेरे पैरों तले जमीन ही खिसक गई। मां अपने बेटे से कह रही थी। 'बेटा अब तू दूसरी शादी कर। बहु को लड़कियों के साथ घर से निकाल देते हैं। आगे का।

           *****बेटियां तो पराई है। और ना पराया धन होती है। बेटी तो अनमोल होती है। धन खर्च होता है। पर बेटी यह ऐसा अनमोल मोती है। जो दो परिवार को एक की माला में पिरोके रखती है।*****

                                 // धन्यवाद //

Comments

  1. बेटियाँ अनमोल होती हैं,पर दहेज रूपी दानव के कारण समस्या बन जातीं हैं।

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  2. Asikcha hi kuritiyo ko janm deti he.
    Kanya bhaar nahi abhaar hoti he jo leti kuch nahi,samasya kanya me nahi neech samajik vyavastha me he.

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