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घोसला (पार्ट-3)


                             घोसला (पार्ट-3) 

              एक दिन मेरे ससुराल वालों ने मुझे, मेरी बेटियों के साथ घर से बाहर निकाला। मैं और मेरी बेटियां हम रात भर घर से बाहर दरवाजे पर ही पड़े रहे। मुझे लगा मेरी नहीं तो कम से कम मेरी बेटियों की दया कर। मुझ पर रहम करेंगे। लेकिन बेटे की चाहत में ए लोग पुरी तरह से निर्दय हो चुके थे। इन लोगों ने मेरी नन्ही सी बेटियों की भी परवाह नहीं कि। मैंने अपने सपने में भी नहीं सोची थी। कि कभी मेरे साथ ऐसा भी हो सकता है।
     
              अब मैं कहां? जाऊं मेरी समझ में नहीं आ रहा था। मेरे, माता-पिता के लिए। मैं मर चुकी थी। उन लोगों ने कभी पलटकर मेरी कोई खबर नहीं ली थी। मेरी एक बेटी 5 साल की और दूसरी बेटी 2 साल की थी। इन बच्चो को लेकर मैं कहां? जाऊं दिमाग में इस सवाल ने उठल- पुथल मचा रखा था।

             दूसरी सुबह जब हमें पड़ोसियों ने घर के बाहर देखा। तो वहां मोहल्ले वाले जमा हुए। सब पूछने लगे क्या? हुआ तो आवाज सुनकर घर के अंदर से मेरे सास-ससुर और प्रशांत मेरे पति बाहर आए। अब मुझे लगा कि लोगों के सवालों का जवाब ना देते हुए। अपनी मान, प्रतिष्ठा का लिहाज रखते हुए। मुझे घर बुला लेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। इन लोगों ने मुझ पर ही बदचलन का आरोप लगा दिया। अब सभी का मुंह बंद हुआ और मुझे ही भला बुरा कहकर वहा से चले गए।

               अब मेरे लिए एक ही रास्ता बचा था। मन में एक ही बात आ रही थी। कि मैं मर जाऊं। पर बच्चों को देखकर मेरी रूह कांप गई। मैंने उन्हें 9 महीने अपनी कोख में पाला था। फिर अपनी ही हाथों से मै अपनी संतान को कैसे मार सकती थी। मैंने हिम्मत की। अपने आप को संभाली। और बच्चों को लेकर बस अड्डे पर गई।

              मुझे नहीं मालूम कहां जाना है। पर मुझे जाना था। इस गांव से दूर। मैं बच्चों को लेकर बस में बैठी और चल पड़ी। कुछ देर में बस कंडक्टर टिकट कटवा ते हुए। मेरे पास आया। मेरे हाथ- पैर कांपने लगे। अब मैं क्या करूंगी। मेरे पास तो पैसे ही नहीं थे। कंडक्टर ने मुझे टिकट के लिए बोला। तो मैं हाथ जोड़कर होने लगी। और रोते रोते ही कहा 'आप मुझे आगे किसी भी गांव में उतार देना। मेरे पास पैसे नहीं है।' पर कंडक्टर नहीं माना। उसे अपनी ड्यूटी जो करनी थी।

              मुझे कंडक्टर धमकाने लगा और कहां "किसी भले घर की तो लग रही हो फिर झूठ क्यों? बोलती हो। पैसे नहीं है। पैसे नहीं थे तो बैठी क्यों? टिकट कटा नहीं तो यहां उतार दूंगा।" मैं और जोर से रोने लगी। मुझे रोता देख मेरी बच्ची भी रोने लगी थी। और बाकी सवारी हमें ही देख रहे थे। मैं हाथ पांव पकड़ कर मिन्नतें करने लगी। पर कोई असर नहीं हुआ।

     
              बस कंडक्टर ने हाथ पकड़ा और बस से उतरने लगा। तभी पीछे से यह सज्जन व्यक्ति ने कंडक्टर को रोकते हुए कहा "भाई, इनकी टिकट का पैसा मैं दे रहा हूं। उन्हें मत उतारो" अब वह सज्जन व्यक्ति ने मेरी टिकट अपने ही गांव की कटा दी और मुझे पास बुला कर बैठने को कहा। मैं उस व्यक्ति के बगल में ही बैठी और सुसक- सुसक कर रोने लगी। तब उस वेक्तिने मेरा हाल पूछा।

             मैंने भी रोते-रोते उस व्यक्ति को अपनी पूरी कहानी सुनाइ। आज वह व्यक्ति ही मेरे लिए मां-बाप, भाई, दोस्त, भगवान, सब कुछ था। अब वह गांव भी आया जहां हमें उतरना था। हम बस से नीचे उतरे। उस व्यक्ति ने हमें एक होटल में ले गया। वहां हमने पेट भर खाना खाए। शायद उस व्यक्ति ने हमारी भूख को महसूस कर लिया था। 2 दिन से भूखे थे हम। खाना खाते- खाते ही उस व्यक्ति ने मुझे कहा "बहन मुझे गलत मत समझना। मैं तुम्हारा भाई जैसा ही हूं ।और चिंता मत कर। सब कुछ समय पर छोड़ दे। सब ठीक हो जाएगा। अब तुम मेरे साथ मेरे घर चलो।

             मैंने उनके पैर पकड़ लिए। मुझे उस भाई के रूप में साक्षात भगवान ही मिले थे। मैं बच्चों को लेकर भैया के साथ उनके घर गई । उनके घर में उनकी पत्नी और बच्चे थे उनकी पत्नी ने मेरे बारे में पूछा तो भैया ने ही मेरी पूरी कहानी कह डाली। उनकी तरह ही उनकी पत्नी भी अच्छे विचारों की थी। कहानी सुनते सुनते वह भी मेरे साथ रो पड़ी। और अपने पति से कहा "तुमने बहुत अच्छा किया। जो इसे यहां लेकर आए ।नहीं तो। यह बेरहम दुनिया में कहां भटकती। बाहर के भेड़िए इसे नोच नोच कर खा जाते ।

             मुझे यहां आए। हुए 2 दिन हो चुके थे। मैंने उन दोनों से कहा। जिन्होंने मुझे सहारा दिया था। अब वही मेरे लिए। मां-बाप, सब कुछ थे। मुझे कोई काम और रहने के लिए। एक घर किराय पर दिला दो। वह भैया काम दिलाने के लिए। राजी हुए। पर मैंने कभी कोई कुछ काम ही नहीं किया था। तो काम का अनुभव नहीं था। और फिर मैं, मां बाप के घर से भागी थी। तो कोई प्रूफ भी नहीं था। कि मैं 12th तक पढ़ी हूं। अब इस हालात में ऑफिशियल जॉब मिलने से रही। फिर दूसरा काम था। खेती, बाड़ी का। यानी मजदूरी। मैं यह भी नहीं कर सकती थी। क्योंकि मुझे कुछ आता नहीं था। अब एक ही काम बचा था। मेरे लिए जो मैं आसानी से कर सकती थी।

             घर घर जाकर बर्तन, पोछा और कपड़े धोना। मजबूरी भी थी। अब मुझे तीन पेट पालना था। तो मैंने खुद को इस काम के लिए तैयार की। और वहीं भैया, भाभी की पहचान से चार से पांच घर का काम मिला। किसी के यहां बर्तन कपड़े तो किसी के यहां पोछा लगाना था। अब मुझे लग रहा था। कि मैं अपनी बच्चियों को पाल सकती हूं। आगे कल......

                                   // धन्यवाद //

Comments

  1. क्या कहा जाय जीवन समस्याओं का घर है।
    कहानी अच्छी है।

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