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दही हांडी की परम्परा ।।

                     दही हांडी क्यों? मनाते हैं लोग

          हिंदू मान्यताओं मैं परंपराओं का बहुत महत्व है। विष्णु भगवान के अवतार श्री कृष्णा के जन्म की खुशियों के तौर पर सालों से आ रही है। यह परंपरा हर साल भाद्र मास की अष्टमी तिथि में जन्माष्टमी का त्योहार मनाया जाता है।

         श्री कृष्णा के बाल्यावस्था की बाल लीलाओं को समर्पित एक उत्सव के रूप में दही हांडी का उत्सव महाराष्ट्र और गुजरात में बड़ी ही धूमधाम से मनाया जाता है। और अब बदलते वक्त के साथ यह दही हांडी का उत्सव केवल हमारे देश में ही नहीं बल्कि विदेश के अन्य क्षेत्रों में भी मशहूर हो चुका है।

         दही हांडी का उत्सव हर साल जन्माष्टमी के अगले दिन मनाया जाता है। और वर्ष 2019 को 25 अगस्त को दही हांडी का उत्सव मनाया जाएगा। मान्यताओं के अनुसार श्री कृष्णा के जन्म की खुशी में अगले दिन दही हांडी का उत्सव मनाने की यह परंपरा बन गई है।
         इसमें ज्यादा संख्या में लड़के उपस्थित रहते हैं। और लड़के एक के ऊपर एक चढ़ते जाते हैं। जिससे एक श्रृंखला सा बन जाता है। और "ह्यूमन पिरामिड" की तरह बनाते हुए। ऊंचाई तक पहुंचते हैं। इतनी ऊंचाई तक पहुंचना पड़ता है। जितनी ऊंचाई पर वह दही की हांडी बंधी रहती है। और जो लड़का सबसे ऊपर खड़ा रहता है। जो लास्ट में एक अकेला बच जाता है। वह लड़का ऊंचाई में टंगे मिट्टी के बर्तन को तोडता है। उस मिट्टी के बर्तन में पहले से दही या मक्खन भर कर रखा जाता है।

         दही हांडी का इतिहास बताता है। कि श्री कृष्णा भगवान वासुदेव और देवकी की आठवीं संतान है। जो कंस के अत्याचार को सहते हुए वर्षों तक कालकोठरी (कारागृह) में रहे। कथा अनुसार कंस की हत्या वसुदेव और देवकी की आठवीं संतान से होनी थी। और कंस इस बात को जान गया था।

         इसलिए वसुदेव देवकी की जो भी संतान होती थी। कंस उसे मार देता था। जब आठवीं संतान श्री कृष्ण के रूप में जन्म हुआ तो वसुदेव दैवीय शक्तियों के कारण नन्हे बालकृष्ण को नंद जी और यशोदा के घर रंदावन में पहुंचा आय।


          श्री कृष्णा ने अपनी बाल लीला यही वृंदावन में दिखाई। याने की बाल लीला की कहानी वृंदावन से शुरू हुई। कान्हा को माखन बहुत पसंद था। तो कान्हा नंद गांव में अपने बाल सखा, बाल मित्रों के साथ घर-घर जाकर माखन चुराते थे। और माखन चुराते समय कई बार मटकी भी तोड़ देते थे।

          इसलिए उन्हें माखन चोर के नाम से भी जाना जाता है। और इस माखन चोर से लोग अपना माखन और दही बचाने के लिए मटकी को काफी ऊंचाई पर टांग देते। ताकि माखन चोर कान्हा मटकी तक पहुंच ही ना पाए। पर छोटेलाल, कान्हा की चतुराई और मित्रों की सहायता सब पर भारी पड़ती थी। बाल कन्हैया अपने मित्रों का श्रृंखला बनाते और खुद उन पर चढ़कर मटकी में रखा माखन चुराते और फिर सब मित्रों सहित पूरा माखन चट कर जाते।

           कृष्ण की इसी शरारत को बाल लीला कहां गया है। और इन्हीं बाल लीलाओं को याद करते हुए दही हांडी की परंपरा शुरू हुई।

                    ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः 

                                   // धन्यवाद //

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