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गणपति बाप्पा मोरिया ।। क्या है? "मोरिया" का मतलब ।।


                      गणपति बप्पा मोरिया।। क्या है?
                             "मोरिया" का मतलब।।

मोर गांव का समूचा क्षेत्रों में मोरों के समृद्ध था। इसलिए इस गांव का नाम मोरगांव पड़ा हां और यहां गणेश की सिद्ध प्रतिमा थी जिसे मयूरेश्वर कहां जाता है इसके अलावा राजन गांव, ओझर, सिद्धटेक, मोहड़ ,पाली और लेन्यंद्री यह सात स्थान और भी है। जहां गणेश प्रतिमाओं की पूजा होती है।

गणेश पुराण में दिया गया है। कि दानव सिंधु के अत्याचार से बचने हेतु देवताओं ने गणेश का आव्हान किया था। उस समय गणेश ने सिंधु सोमवार के लिए मयूर को अपना वाहन बनाया। और 6 भुजाओं वाला अवतार लिया था। मोर गांव में गणेश का वही मयूरेश्वर अवतार है। इसलिए मराठी में ही से मोरेश्वर कहा जाता है। वामन भट्ट और पार्वती को मयूरेश्वर की आराधना से ही पुत्र प्राप्ति हुई और परंपरा से उन्होंने आराध्य के नाम पर यह संतान का नाम मोरिया दिया ।

मोरिया बचपन से ही श्री गणेश भक्त थे मोरिया ने थेऊर में जाकर तपस्या की जिसके बाद उन्हें सिद्ध अवस्था में गणेश की अनुभूति हुई। तभी से उन्हें मोरिया अर्थात मोरया गोसावी की प्रसिद्धि मिली थी। उन्होंने वेद वेदांग पुराण उपनिषद की शिक्षा प्राप्त की थी। माता पिता के निधन के बाद पुणे के समीप पूर्णा नदी किनारे चिंचवड में आश्रम बनाकर रहने लगे।

इस आश्रम में मोरया गोसावी अपनी धार्मिक आध्यात्मिक गतिविधियां चलाते थे अब उनकी ख्याति पहले से ज्यादा होने लगी। समर्थ रामदास और संत तुकाराम ईश्वर आते जाते रहते थे। जिनके मन में मोरया गोसावी के लिए नियुक्त मोरया गोसावी के लिए स्नेहा युक्त आदर था। मराठों की प्रसिद्ध गणपति वंदना


       "सुखकर्ता, दुखहर्ता वार्ता विघ्नाची" की रचना संत कवि समर्थ रामदास ने चिंचवड के इसी सिद्ध क्षेत्र में मोरया गोसावी के सानिध्य में की थी ।

मोरया गोसावी चिंचवड में स्थाई होने के बाद भी हर साल गणेश चतुर्थी पर मयूरेश्वर के दर्शन के लिए मोरगांव जाते थे ।कथा अनुसार मोरया गोसावी ने गणेश की प्रेरणा से समीप नदी से जाकर यह प्रतिमा लाई और चिंचवड के आश्रम में स्थापित की और बाद में उन्होंने यहीं पर जीवित समाधि ली थी। फिर बाद में उनके पुत्र चिंतामणि ने समाधि पर मंदिर की स्थापना की थी।

उसके बाद आसपास के अन्य गणेश थानों की सार संभाल के लिए भी मोरया गोसावी ने काम किया। मोरया गोसावी ने ही अष्टविनायक की यात्रा की शुरुआत की थी। विनायक यात्रा की शुरुआत भी मोर गांव के मयूरेश्वर गणेश से होती है। इसलिए मोरिया नाम का जयकारा प्रथमेश गणेश के प्रति होना ज्यादा तार्किक लगता है। ना कि मोरिया का गणेश के आशीर्वाद से जन्म होना। मयूरासन पर विराजित गणेश की अनेक प्रतिमाएं उन्हें ही मोरेश्वर और प्रकारांतर से मोरिया सिद्ध कर जाती है।

मोरया गोसावी भक्त शिरोमणि थे। इसमें कोई शक नहीं है। पर बप्पा मोरिया नहीं सबसे अंत में यह भी जानना जरूरी है ।आपके लिए की शिव परिवार के दो पुत्रों का हमेशा उल्लेख होता है। गणेश और कार्तिकेय और यह कार्तिकेय ही द्रविड़ संस्कृती खास तौर पर शामिल में मुरूगन हो जाते हैं।

           
                              // धन्यवाद //

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