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उस रात जो हुआ।।

             अब मुझे एक एनजीओ में जॉब लगी थी। गवर्नमेंट का प्रोजेक्ट था 7 साल का। इसमें काम था समूह का। मैंने इस काम में भी बड़ी बड़ी डिग्री वालों को पीछे रखा। बहुत जल्दी मैंने इस काम में खुद को झोंक दिया और जल्दी ही तरक्की की।
         मेरी आदत है। मैं जो भी काम हाथ में लेती हूं। उसे बखूबी से करने का हुनर रखती हूं। इसी काम के साथ-साथ थोड़ी समाज सेवा भी कर लेती थी। मैं सारे काम जैसे बैंक से लोन लेना, लोन पास कराना और जल्द से जल्द जरूरतमंदों को दिलाना। सारे काम मैं करती थी। महिलाओं की मीटिंग रात को लीया करती थी। क्योंकि गांव की महिलाएं दिनभर की रोजी-रोटी और घर के काम से रात को ही मिलती थी ।अक्सर मुझे एक गांव से दूसरे गांव जाना पड़ता था।

         एक दिन ट्रेन समय से 3 घंटे लेट आने वाली थी। और शाम के 7:00 बजे के बाद टैक्सी नहीं चलती। अब मुझे ट्रेन के लिए 3 घंटे वेट करना था। मेरे साथ एक और महिला थी ।जो मेरे ऑफिस में काम करती थी। वह मेरे गांव के पास के गांव से ही थी। हमें एक ही ट्रेन से जाना था। तो हम एक साथ रुके थे वह जल्दी जाने के लिए। किसी गाड़ी वाले को तलाश कर रही थी। ताकि लिफ्ट मांग कर जा सके।

          उसी के गांव का एक वेक्ती गांव की तरफ जा रहा था। उसी ने उसे रोका और कहा कि हमें अपने साथ लेते चले। मैं नहीं पहचानती थी। और मैं जाना भी नहीं चाहती थी। पर दोनों की जीत के कारण मैं भी उनके साथ चल दी। 17 किमी दूरी पर हमारा गांव था। हम गांव पहुंचे ही थे। कि मेरे पति ने मुझे देख लिया। अब वहां से मैं अपने पति के गाड़ी पर बैठी घर गई। उस रात आधी रात को मुझे मेरे पति ने जगाया। और सवाल- जवाब करने लगा। मैंने कहा मैं उसे नहीं जानती पर वह उसके (जो मेरे साथ थी) गांव का है। मेरी किसी बात को नहीं माना और मुझे कमर बेल्ट (जो चमड़े का) था उससे बहुत मारा मैं मार खाते-खाते झल्ला गई। मेरे मुंह से दर्द भरी आवाज निकलना बंद हो गई। लेकिन इस जालिम का हाथ नहीं रुका। मैंने झटकेसे बेल्ट छीनी और दे मारी उसे भी।

          और कहा 'मैं कमजोर नहीं हूं। तुझ जैसे निकम्मे को पालने की ताकत रखती हूं। तू मेरा पति है। और मैं अपना पत्नी धर्म निभा रही हूं। इसलिए मैं चुप रहती हूं।' इसका मतलब यह नहीं कि मैं अबला नारी हूं। आज पहली बार वह मुझसे डरा था। दूसरे दिन रात की मार से शरीर तप रहा था ।पूरा शरीर लाल हो चुका था। दर्द से कराह रही थी फिर भी मुझे फील्ड पर जाना पडा। विजिट के लिए ऑफिसर आए हुए थे उन्हें काम का विवरण दे रही थी। पर एक ऑफिसर बड़ी गौर से मेरी ओर देख रहा था। मेरी लाख कोशिशों के बाद भी आंखों से पानी छलक रहा था। उन्होंने देखा मेरा शरीर आग की तरफ तप रहा है। और कुछ मेरी हालत देख। इसका कारण पूछा तो मैं अपने आप को नहीं संभाल पाई और पहली बार घर का हाल बाहर बयां कर गई।

         मना करने के बाद भी ऑफिसर नहीं माने और मुझे घर छोड़ा। उन्होंने मेरे पति को समझाया और साथ में धमकाया भी इसके बाद मारपीट किया तो सीधा अंदर कर देंगे। ऑफिसर जाने के बाद फिर शुरू हुआ। अब इसके दिमाग में कुछ और फितूर घर कर गया। पहले जबरदस्ती मुझ पर कीचड़ उछालने लगा और फिर जल्दी ही तेवर बदलते हुए मुझे समझाने लगा। उसने मुझे ऐसी पट्टी पढ़ाई कि मुझे आप लोगों को बताने में भी शर्म आ रही हैं। कोई स्वाभिमानी महिला सपने में भी नहीं सोचेगी इतनी गन्दी और घटिया बात कही थी उसने मुझसे। वह चाहता था। मैं जॉब छोड़ दू। जो छोटे-मोटे काम करके पैसे जोड़ती थी। वह छोटे-मोटे काम छोड़ दू। और कुछ ऐसा काम करू जिससे कम समय में ज्यादा पैसा मिले और मुझे देर तक बाहर जाना भी ना पड़े वह जानता था। अच्छे अच्छे बड़े-बड़े आफीसरो से मेरी जान पहचान थी। पर वह यह नहीं जानता था। कि यह पहचान और मान-सम्मान मुझे मेरी मेहनत ने दिया था। मेरी ईमानदारी मेरे स्वाभिमान ने दिया था।

            वह चाहता था। मैं इस पहचान का गलत इस्तेमाल करू। उन्हें अपनी जाल में फांस कर उनसे पैसे कमाऊ और उसके हाथ में दू। अब उस दिन से उसने मुझे मारना बंद किया था। मारता नहीं था पर रात भर सोने भी नहीं देता। मुझे बात-बात पर ट्रोचर करता। अब मुझे वह मानसिक पीड़ा देने लगा था। बच्चों को कभी सीने से नहीं लगाया था। तो उन्हें कभी पिता का प्यार मिला ही नहीं। पर अब इसकी बढ़ती हैवानियत के चलते बच्चे डरने लगे थे। बेटे को 5th क्लास से हॉस्टल में रखा। बाहर सीटी में पढ़ाने भेजा। अब बेटी का टेंशन था। दिन भर अपना काम (जॉब) करती और रात में वहीं टॉर्चर, वही झगड़ा।

             अब मुझे इन चीजों की आदत होने लगी थी। मैं ध्यान ही नहीं देती थी। अब मैंने खुद को समझा लिया। मैं अपने जीवन में अकेली हूं। पति होने के बाद भी एक विधवा की तरह जीवन की इस लड़ाई में अकेली थी। पति तो सिर्फ बिस्तर पर मिलता एक घंटे के लिए। बाकी सफर में तो वह था ही नहीं।

              बस एक आशा, उम्मीद जगाए रखा। इंसान में मैच्योरिटी के साथ बदलाव आ सकता है। और जैसे चल रहा था। चलने दिया इस संघर्ष में मैंने अपना दर्द अपने पास ही रखा और मायके वाले हो या सास, ससुर इनको अपने दर्द से अनजान रखा। दोनों परिवार का साथ नहीं छोड़ा मेरी तीन बहनों की शादी हो चुकी थी। और ससुराल में दोनों ननद की । सभी शादियों में, मैं आगे ही रही। दोनों परिवारमें मैहि बड़ी हूं।

             जिस झोपड़ी में, मैं आई थी। वहां अब घर है। घर की छत पर बड़ी-बड़ी कवेलू (खपरा) है। ससुराल में मेरा मान सम्मान बढ़ गया था। मेरे सास - ससुर मुझे बेटी से ज्यादा चाहने लगे।  जो मुझे दूधकारते थे। वही अब मेरे सिवा एक कदम नहीं चलते थे। क्योंकि मैंने अपना बहू का फर्ज निभाया था। जो बेटे को निभाना था। पर वह लायक था नहीं। पर मैं कैसे इन लोगों को उस गरीबी में जीने देती। आखिर वह भी थे तो मेरे ही।

             पति के जुर्म सहती रही और बाकी लोगों की जिंदगी सवार ती रही। मुझे, मेरा पति मेरा जमीर बेचने के लिए उकसाता रहा। पर मैं भी डटी रही अपने स्वाभिमान को बचाने के लिए। अब मेरा पति मेरे दिलो दिमाग से उतर चुका था। अब इसके साथ नहीं रहना चाहती थी। पर मैं मजबूर थी। मेरी एक बहन की शादी होनी बाकी थी। अगर मैं छोड़ कर चली जाती। तो यह मेरी बहन की जिंदगी बर्बाद कर देता। इसी डर से मैं चुपचाप उसके अत्याचार साथी गई।
     
             वक्त रेत की तरह फिसलता गया। अपने संघर्ष से मैं ना हारी। ना जिम्मेदारियों से दूर भागी। हर वह एक रिश्ता मैंने बखूबी से निभाया। हर रिश्ते को मैंने सीने से लगाया। और हर पल अपनी इच्छाशक्ति को जगाए रखा। मेरा वक्त मुझे बदलना है। मेरी जिंदगी का यही यह नीश्चय था।" एक इच्छा कुछ नहीं बदलती पर एक निर्णय कुछ बदलता है। और एक निश्चय सब कुछ बदल देता है। आगे कल ।

                       // धन्यवाद //

Comments

  1. सबसे लड़ना आसान है पर अपनो से लडना बड़ा कठिन है।

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  2. विवेक पूर्ण निर्णय हर कष्ट से मुक्ति दिलाने वाला ब्र्महास्त्र है।

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